India dolphins, gharials, spotted eagles face threat by ingesting plastic

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नैरोबी। गंगा और मेकांग नदी बेसिन क्षेत्रों में प्लास्टिक प्रदूषण के कारण प्रवासी पक्षियों तथा अन्य जीवों को जबर्दस्त खतरे की बात कही गई है। प्लास्टिक प्रदूषण और प्रवासी प्रजातियों के बारे में मंगलवार को एक नई रिपोर्ट में इस तरह के क्षेत्रों में इन जीवों पर इसके जोखिम का आकलन किया गया। दोनों नदी बेसिनों के जीव संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (सीएमएस)के तहत संरक्षित हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि गंगा नदी में, डॉल्फिन, घड़ियाल और बड़ी चित्तीदार चील के यहां की गंदगी को खाने और मलबे में फंस कर मरने का खतरा है। गंगा और मेकांग नदियाँ हर साल हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में अनुमानित रूप से 2,00,000 टन प्लास्टिक प्रदूषण में योगदान करती हैं।

यह रिपोर्ट मेकांग और गंगा नदी घाटियों में प्रवासी प्रजातियों के लिए प्लास्टिक प्रदूषण का जोखिम मूल्यांकन, मीठे पानी और स्थलीय प्रजातियों पर प्लास्टिक प्रदूषण के प्रभावों पर केंद्रित है। इसे संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा (यूएनईए) के पांचवें सत्र के दौरान लॉन्च किया गया था। जिसमें 150 से अधिक देशों के पर्यावरण मंत्रियों और अन्य प्रतिनिधियों के प्लास्टिक प्रदूषण,जैव विविधता, स्वास्थ्य, हरित अर्थव्यवस्था पर एक वैश्विक समझौते को आगे बढ़ाने की उम्मीद है।

सीएमएस के कार्यकारी सचिव एमी फ्रेंकेल ने रिपोर्ट को लेकर आईएएनएस को बताया “यह अध्ययन पुष्टि करता है कि प्लास्टिक प्रदूषण मीठे पानी और स्थलीय क्षेत्रों में प्रवासी प्रजातियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। यह ऐसी प्रजातियों पर संभावित जोखिम का आकलन करने के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है जिनका वैश्विक स्तर पर उपयोग किया जा सकता है।”

ऐसे कई अध्ययन हैं जो समुद्री जीवों पर प्लास्टिक प्रदूषण के प्रभाव की जांच करते हैं लेकिन मीठे पानी की प्रजातियों पर पड़ने वाले प्रभावों का बहुत कम अध्ययन किया जाता है।

मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्र में प्लास्टिक पर शोध सभी जलीय वातावरणों में अध्ययन किए गए प्लास्टिक का केवल 13 प्रतिशत है। प्लास्टिक प्रदूषण के प्रभावों पर अध्ययनों में से केवल चार प्रतिशत स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र के लिए प्रासंगिक हैं।

गंगा और मेकांग दोनों नदियाँ सीएमएस के तहत संरक्षित 605 प्रजातियों को पर्यावास मुहैया कराती हैं, जिनमें मीठे पानी की प्रजातियाँ, स्थलीय जीव और पक्षी शामिल हैं। उनमें से कई को आईयूसीएन द्वारा संकटग्रस्त या संकटग्रस्त के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

यह अनुमान लगाया गया है कि गंभीर रूप से लुप्तप्राय मेकांग कैटफिश और इरावदी नदी की डाल्फिन को प्लास्टिक के घातक खतरों का सामना करना पड़ रहा है। इरावदी नदी में डॉल्फिन की संख्या 100 से कम है और इनके जाल में उलझकर मारे जाने का अधिक खतरा है। मेकांग कैटफिश को निचले मेकांग पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए एक प्रमुख प्रजाति माना जाता है। यह लंबे समय तक जीवित रहती है और लंबी दूरी तक प्रवास करती है। यही कारण इसे प्लास्टिक और बांधों जैसे मानवीय व्यवधानों के प्रति और भी अधिक संवेदनशील बनाता है।

गंगा में, इस डाल्फिन के मछली पकड़ने के जाल विशेष रूप से गिलनेट में उलझने का उच्च जोखिम है। इसके अलावा माइक्रोप्लास्टिक का भक्षण भी अतिरिक्त खतरा है। घड़ियाल के मछली के जाल में फंसने का अधिक जोखिम है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि पक्षियों में ईगल को इसके खतरे का जोखिम अधिक है।

एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सीएमएस ने लगभग 500 प्रजातियों को सूचीबद्ध किया है और इनमें से 80 प्रतिशत पक्षियों की आबादी है जिनका प्लास्टिक भक्षण तथा इसके मलबे में फंसने का जोखिम अधिक है।

यह भी देखा गया है कि प्रवासी पक्षी मछली पकड़ने के जाल और और जहाजों के मलबे का उपयोग करके प्लास्टिक से धागों से घोंसले बनाते है, जिसके परिणामस्वरूप अक्सर उनके चूजे उनमें उलझ जाते हैं।

इस मूल्यांकन में ईगल की दो प्रजातियां विशेष रूप से प्रभावित पाई गई हैं जिनमें गंगा में बड़ी चित्तीदार चील मलबे में फंसी चीजों को खाने और इसमें उनके उलझने से वे मर भी सकती है।

मेकांग में, ईस्टर्न रायल ईगल को प्लास्टिक भक्षण और इसमें फंसने का भी अधिक जोखिम अधिक देखा गया है। ग्रेलेग गूज, कॉमन शेल्डक, गैडवॉल, नॉर्दर्न पिंटेल, कॉमन टील, रेड-क्रेस्टेड पोचार्ड और टफ्टेड डक जैसे जलपक्षी पर्यावरण में मौजूद प्लास्टिक के साथ रह सकते हैं और कई बार ये जलपक्षी माइक्रोप्लास्टिक सहित अन्य प्रकार की प्लास्टिक भी खा जाते हैं।

इनके साथ ही, ब्लैक-टेल्ड गॉडविट, यूरेशियन कर्लेव, मार्श सैंडपाइपर, कॉमन ग्रीनशैंक, ग्रीन सैंडपाइपर और टेम्मिनक स्टेंट जैसे जलपक्षी भी मछली पकड़ने के जाल में उलझ जाते हैं।

स्थलीय प्रजातियों में, एशियाई हाथियों को भोजन की तलाश में कचरे युक्त स्थानों पर प्लास्टिक खाते हुए देखा गया है लेकिन इन पर प्लास्टिक खाने से पड़ने वाले प्रभावों की अभी कोई जानकारी सामने नहीं आई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में और अधिक जानकारी के लिए मीठे पानी और स्थलीय वातावरण पर अधिक शोध आवश्यक है। (आईएएनएस)

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